kharif crops

खरीफसलों में व्यवहारिक खरपतवार प्रबंधन

शैलेंद्र सिंह, रविन्द्र प्रताप सिंह जैतावत, एवं लखमा राम चौधरी

राजस्थान कृषि महाविद्यालय, उदयपुर, राजस्थान

खरीफ़ फसलों का भारतीय कृषि व देश की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाये रखने में  बहुत  महत्वपूर्ण योगदान रहा है । विगत कुछ वर्षों  के आकड़ों  के आधार पर ये फसलें  औसतन 67.7 मिलियन हैक्टर  भूमि पर उगायी जा रही  है  और लगभग 128.1 मिलियन टन खाद्यान्न का उत्पादन करती है । अगर दोनों  मौसम की फसल-उत्पादकता पर ध्यान दे तो काफी  अंतर दिखाई पड़ता है । खरीफ़ फसलों  की  उत्पादकता  1892 किलोग्राम / हैक्टर है जो कि देश की रबी फसल की  उत्पादकता (2431 किलोग्राम / हैक्टर) से काफी  पीछे है. जिसमें अकेले खरपतवारों  के कारण 15-70 प्रतिशत तक की हानि होती है जबकि कीटों  से लगभग 22 प्रतिशत व बीमारियों से लगभग 29 प्रतिशत होती है । खरपतवार भूमि से पानी खनिज पोषक तत्वों  को भी अवशोषित करते  है, इसके अलावा कुछ जहरीले खरपतवार जैसे गाजर घास, धतुरा आदि न केवल फसल उत्पादन की गुणवत्ता को कम करते है बल्कि मनुष्यों और पशुओं के स्वास्थ्य के लिए भी खतरा उत्पन्न करते हैं। इसलिए, खरपतवारों का समय पर नियंत्रण बहुत जरूरी  हैं। राजस्थान में खरीफ़  ऋतु  की मुख्य अनाज फसलों में बाजरा, ज्वार व मक्का, तिलहनी फसलों मे  मूंगफली, सोयाबीन व तिल, दलहनी फसलों मे  मूंग, मोठ, उड़द व लोबिया नकदी वाली फसलों में ग्वार, कपास व गन्ना एवं चारा फसलों के लिए ज्वार, बाजरा व लोबिया को मुख्य रूप से उगाया जाता हैं। आधुनिक कृषि में खरपतवार नियंत्रण मुख्य रूप से शाकनाशी दवाइयों के इस्तेमाल से किया जाता है क्योंकि इसमें समय कम लगता है और इनका प्रयोग भी आसान हैं। हालाँकि कि इन रसायनों का पर्यावरण पर बुरा असर पड़ता हैं। इसलिए खरपतवार नियंत्रण के दूसरे तरीकों को प्रयोग में लाना लम्बे समय तक ज्यादा उपयोगी एवं प्रभावी सिद्ध होता हैं। इनमें मुख्य रूप से फसल चक्र होता है क्योंकि खरपतवार नियंत्रण में फसल चक्र सबसे ज्यादा उपयोगी सिद्ध हुआ हैं। इसके अतिरिक्त ग्रीष्मकाल में गहरी जुताई, फसल की लाइनों में बुवाई, बुवाई का सही समय, अन्तः फसल प्रणाली, फसलों की सघन बिजाई, अन्धी-जुताई, प्रारम्भ में शीघ्र बढ़वार वाली फसलें, पा͝लीथीन अथवा भूसा आदि की पलवार, खरपतवार रहित शुद्ध बीज, पूर्ण सड़ी हुई गोबर की खाद का प्रयोग, समय पर निराई-गुड़ाई आदि उपायों द्वारा भी सफल खरपतवार प्रबन्ध किया जा सकता हैं। इन सभी उपायों के इस्तेमाल से हम अपनी फसल को खरपतवार रहित बना सकते है और अधिक फसल उत्पादकता प्राप्त कर सकते हैं। इस क्षेत्र की खरीफ़ मौसम की फसलों में पाए जाने वाले मुख्य खरपतवार व उनकी रोकथाम के उपाय निम्न प्रकार है:-

मक्का व ज्वार

मक्का व ज्वार में उगने वाले प्रमुख खरपतवार चौलाई, भंगड़ा, स्ट्राइगा, मकड़ा, विषखपरा, हजारदाना, जंगली जूट, दुद्दी, हुलहुल, लूनिया, सैंजी इत्यादि हैं। यदि खेत की खरपतवार न निकाली जाए तो पैदावार में 50 प्रतिशत या इससे भी अधिक कमी हो सकती  हैं। बुवाई के 3-6 सप्ताह बाद खुरपी अथवा हैण्ड हो से गुड़ाई करनी चाहिए। इससे मृदा में वायु संचार भी बढ़ता हैं।

खरपतवारों की रोकथाम 0.75 – 1.0 कि.ग्रा. सिमाजीन या एट्राजीन (50 प्रतिशत घुलनशील पाऊडर) प्रति हैक्टर 600 – 800 लीटर पानी में मिलाकर बुवाई के तुरन्त बाद छिड़कने से की जा सकती हैं। वार्षिक घास कुल एवं कुछ चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों की रोकथाम हेतु पेंडिमेथालिन (30 प्रतिशत) 1.0 – 1.5 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर सक्रिय तत्व अकुंरण से पूर्व काम में लिया जा सकता हैं। रेतीली जमीनों में रसायनों की कम और मध्यम से भारी जमीनों में अधिक मात्रा का प्रयेाग करना चाहिए। चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियन्त्रण के लिए 1.0  कि.ग्रा प्रति हैक्टर की दर से 2,4-डी     का उपयोग बुवाई के 30-35 दिन बाद किया जा सकता हैं।

बाजरा

खरीफ़ की अन्य फसलों की तरह बाजरे में भी खरपतवार नियंत्रण अत्यन्त आवश्यक हैं। इसमें उगने वाले खरपतवारों में मुख्य रूप से चौलाई, भंगड़ा, दुद्दी, जंगली जूट, हजारदाना, हुलहुल, लूनिया, स्ट्राइगा, मोथा व पथरी हैं। बुवाई के 3 से 4 सप्ताह बाद निराई-गुड़ाई करें। पौधों के नजदीक गहरी गुड़ाई न करें ताकि जड़ों को नुकसान न हो अन्यथा पैदावार पर भी प्रतिकूल असर पडे़गा। ब्लेड हो या व्हील हो से भी गुड़ाई की जा सकती हैं। इन यंत्रों को बुवाई के 15 दिन बाद प्रयोग करना अच्छा रहता है क्योंकि खरपतवार छोटे और नियंत्रण में आने योग्य होते है। हर अच्छी वर्षा के बाद इन यंत्रों का प्रयोग नमी सरंक्षण में भी सहायता करता हैं। खरपतवारों की रोकथाम रसायनों द्वारा भी की जा सकती  हैं। बुवाई के तुरन्त बाद 1.0 कि.ग्रा. एट्राजीन सक्रिय तत्व (50 प्रतिशत घुलनशील पाउडर) प्रति हैक्टर 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़कने से खरपतवारों पर प्रभावकारी नियंत्रण पाया जा सकता हैं। अंकुरण से पहले 0.75 कि.ग्रा. पेंडिमेथालिन सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर की दर से उपयोग करके भी खरपतवार नियन्त्रण किया जा सकता हैं।

तिलहनी फसले

खरीफ़ मौसम में तिलहनी फसलों में मुख्यतः मूंगफली, सोयाबीन एवं तिल उगाई जाती हैं। इनके प्रमुख खरपतवार मोथा, दूब, बडी दुद्दी, पथरी, लेहसुआ, कनकुआ, हजारदाना हैं। तिलहनी फसलों में खरपतवार नियंत्रण के लिए खरपतवार नाशक दवाईयों की बजाए अन्तः कृषि क्रियाओं यानि कि निराई-गुड़ाई की सिफारिश की जाती हैं। मूंगफली व सोयाबीन की फसल में दो बार निराई-गुड़ाई करके प्रभावकारी ढंग से खरपतवारों पर नियंत्रण पाया जा सकता हैं। पहली निराई-गुड़ाई बुवाई के 3 सप्ताह बाद करनी जरूरी हैं। तिल को विशुद्ध रूप से बोने पर फसल में बुवाई के तीसरे सप्ताह के बाद खरपतवार हो हाथों से अच्छी तरह निकाल देना चाहिए। रासायनिक नियंत्रण हेतु फ्लूक्लोरेलिन 1.0 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर बुवाई से पूर्व मिट्टी में मिलाकर अथवा पेडिंमेथालिन 1.0 कि.ग्रा. या एलाक्लोर 1.0 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर का बुवाई के बाद लेकिन फसल के पौधे निकलने से पूर्व छिड़काव करके घास व चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों का नियंत्रण किया जा सकता हैं। इमेजाथापाइर का बुवाई के 1-2 दिनों बाद 100 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर छिड़काव करने से फसल खरपतवार रहित परिस्थितियों में अंकुरित होती हैं।

 

दलहनी फसले

मूंग, मोठ, उड़द व लोबिया खरीफ़ मौसम की महत्वपूर्ण दलहनी फसलें हैं। इन फसलों में मुख्य रूप से बाथु, पथरी, चौलाई, कनकुआ, चटरी, मकड़ा, मोथा, लेहसुआ, बरू, हजारदाना, मकोय आदि पाए जाते हैं  दलहनी फसलों को खरपतवारों से मुक्त रखने के लिए बुवाई के 15-20 दिन बाद निराई-गुड़ाई करना अत्यंत आवश्यक हैं। दूसरी निराई-गुड़ाई आवश्यकतानुसार बुवाई के 35-40 दिन बाद करनी चाहिए। फ्लूक्लोरेलिन 45 ई.सी. नामक शाकनाशी  की 2.5 लीटर मात्रा को 600-700 लीटर पानी में घोलकर बुवाई के पहले प्रति हैक्टर की दर से भूमि पर छिड़काव करके मिट्टी में मिला देना चाहिए अथवा बुवाई के बाद परंतु अंकुरण से पूर्व पेंडिमेथालिन या एलाक्लोर शाकनाशी  के 750 ग्राम सक्रिय तत्व को प्रति हैक्टेयर की दर से 600 लीटर पानी में छिड़काव करने पर सभी प्रकार के खरपतवारों को नष्ट किया जा सकता हैं। बुवाई के बाद किन्तु अंकुरण से पहले इमेजाथापाइर 100 ग्राम प्रति हैक्टर सक्रिय तत्व के प्रयोग से अधिकतर संकरी एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों पर अंकुरण से पहले प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता हैं।

ग्वार

यह एक बहुउपयोगी फसल है जिसे दाना, चारा, सब्जी, हरि खाद इत्यादि के लिए उगाया जाता हैं। दाने के भ्रूण में गम होने के कारण यह एक औद्योगिक फसल भी हैं। ग्वार में मुख्य रूप से दूब, मोथा, बरू, चौलाई, जंगली जूट, हजारदाना, दुद्दी इत्यादि खरपतवार पाये जाते हैं। दलहनी फसलों की तरह खरपतवारों का प्रकोप ग्वार में भी कम होता हैं। फसल में पहली निराई-गुड़ाई बुवाई के 20-25 दिन बाद कर देनी चाहिए। आवश्यकता होने पर एक और निराई-गुड़ाई की जा सकती हैं। रासायनिक खरपतवार नियंत्रण हेतु फ्लूक्लोरेलिन या ट्राईफ्लूरेलिन 0.75 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर की दर से फसल बुवाई से पूर्व खेत में छिड़ककर ऊपरी सतही मिट्टी में मिला देना चाहिए। वार्षिक घास कुल व चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों की रोकथाम हेतु पेंडिमेथालिन (30 प्रतिशत) 1.0 – 1.5 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर सक्रिय तत्व अंकुरण से पूर्व काम में लिया जा सकता हैं।

कपास

कपास में मुख्य रूप से दूब, मोथा, बरू, सांठी, चौलाई, जंगली जूट, पथरी आदि खरपतवार मुख्य रूप से पाये जाते हैं। कपास की प्रारम्भिक वृद्धि धीमी होती हैं। इस कारण खरपतवारों की समस्या अधिक रहती हैं। खरपतवारों के नियंत्रण के लिए 2-3 बार निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। पहली गुड़ाई खुरपी से पहली सिंचाई से पहले करें। बाद में हर सिंचाई या वर्षा के बाद समायोज्य कल्टीवेटर से करनी चाहिए। रासायनिक खरपतवार नियंत्रण के लिए फ्लूक्लोरेलिन (1.0 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर) का बुवाई से पहले सतही मिट्टी में मिलाकर अथवा पेंडिमेथालिन (1.0 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर) या डाइयूरान (0.5 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर) का बुवाई के बाद लेकिन फसल अंकुरण से पहले प्रयोग करके प्रभावी खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता हैं। ब्यूटाक्लोर 1.0 – 1.25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर बुवाई के 2-3 दिन के अन्दर प्रयोग करने से वार्षिक घास कुल व चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों का नियंत्रण अच्छा होता हैं।

चारे की फसलें

खरीफ़ मौसम में चारे की फसलों में मुख्य रूप से ज्वार, बाजरा व लोबिया उगाई जाती हैं। वैसे तो आम धारणा यह होती है कि चारे की फसलों में खरपतवार नियंत्रण की कोई जरूरत नहीं होती क्योंकि खरपतवार से भी चारा मिलता हैं। लेकिन खरपतवारों की उपस्थिति से फसल पर बहुत बुरा असर पड़ता हैं। क्योंकि इससे एक तो फसल की पैदावार कम होती है और दूसरा गुणवत्ता में कमी आती है और पोषक तत्वों की कमी के कारण स्वादिष्ट चारा भी नहीं मिल पाता।

चारे की फसलों में खरपतवार नाशक दवाइयों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है क्योंकि इसका सीधा असर पशुओं पर पड़ता हैं। इसलिए खरपतवार नियंत्रण के लिए निराई-गुड़ाई की सिफारिश की जाती हैं। ज्वार, बाजरा, लोबिया व ग्वार में फसल उगने के 15-20 दिन बाद खुरपी द्वारा एक बार निराई-गुड़ाई करना लाभदायक रहता हैं। इससे खरपतवार नियंत्रण के साथ-साथ मृदा संरक्षण व पौधों की बढ़वार में भी इजाफा होता हैं। हाथी घास में हर कटाई के बाद तथा खाद देने से पहले फसल की हल से जुताई कर देनी चाहिए ताकि मिट्टी ढीली पड़ जाए और भुरभुरी बन जाए। इससे खरपतवार भी खत्म हो जाती है और यह इस फसल के लिए काफी लाभदायक रहता हैं।

सारणी1 : विभिन्न उपयोगी  खरपतवार नाशक रसायनों से संबन्धित जानकारी

रसायन का नाम व्यापारिक नाम उपयोग की मात्रा (ग्राम सक्रिय तत्व/हे. ) उपयोग का समय   खरपतवार का प्रकार जिन पर उपयोगी
मक्का व ज्वार  
एलाक्लोर लासो, क्रोपस्टार,जज 1500–2000 बुवाई के 2-3 दिन के अंदर एकवर्षीय घास एवं कुछ चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार
पेंडिमेथालिन स्टोम्प,वेलौर,पेंडिस्टार, 1000-1500 बुवाई के 1-3 दिन के अंदर एकवर्षीय घास एवं कुछ चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार
मेटोलाक्लोर ड्यूअल, 1000-1500 बुवाई के 2-3 दिन के अंदर एकवर्षीय घास एवं कुछ चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार
2,4-डी फेर्नोक्सोन,वीडार, वीडमार 500-750 बुवाई के 25-30  दिन बाद चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार
एट्राजिन एट्राटेफ 500-750 बुवाई के 1-2  दिन के अंदर अधिकांश खरपतवारों पर उपयोगी
बाजरा  
2,4-डी फेर्नोक्सोन,वीडार, वीडमार 500 बुवाई के 25-30  दिन बाद चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार
एट्राजिन एट्राटेफ 500 बुवाई के 1-2  दिन के अंदर अधिकांश खरपतवारों पर उपयोगी
पेंडिमेथालिन स्टोम्प,वेलौर,पेंडिस्टार, 1000 बुवाई के 1-3 दिन के अंदर एकवर्षीय घास एवं कुछ चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार
दलहनी फसले 
फ्लुक्लोरालीन बेसलिन 750-1000 बुवाई से पहले मिट्टी में समायोजन घास कुल के खरपतवारों पर विशेष उपयोगी
एलाक्लोर लासो, क्रोपस्टार,जज 1000-1500 बुवाई के 2-3 दिन के अंदर एकवर्षीय घास एवं कुछ चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार
क्विज़ोलोफोप अस्योर, टरगासुपर 50 बुवाई के 15-20  दिन बाद घास कुल के खरपतवारों पर उपयोगी
इमेजाथापाइर परसुइट, हैमर 100 बुवाई के 15-20  दिन बाद एकवर्षीय घास एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार
मेटोलाक्लोर ड्यूअल, 1000-1500 बुवाई के 2-3 दिन के अंदर एकवर्षीय घास एवं कुछ चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार
आइसोप्रोटूरोन अरेलोन,ग्रामीनोन 750 बुवाई के 25-30  दिन बाद चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार एवं कुछ एकवर्षीय घास
ग्वार 
फ्लुक्लोरालीन बेसलिन 750 बुवाई से पहले मिट्टी में समायोजन घास कुल के खरपतवारों पर विशेष उपयोगी
कपास
डाइयूरान कारमेक्स 500 बुवाई के 2-3 दिन के अंदर अथवा बुवाई के 35-40  दिन बाद अधिकांश एकवर्षीय घास एवं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार
पेंडिमेथालिन स्टोम्प,वेलौर,पेंडिस्टार, 1000- 1500 बुवाई के 1-3 दिन के अंदर एकवर्षीय घास एवं कुछ चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार
ब्यूटाक्लोर मचेटे,सीपी -53619 1000-1250 बुवाई के 2-3 दिन के अंदर घास कुल व चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार

 

  1. छिड़काव करते समय पवन वेग कम हो और अति संवेदनशील फसलों पास छिड़काव के  हुए पवन की दिशा का ध्यान रखे।
  2. छिड़काव हुई फसलों से पशुओं को दूर रखें।
  3. 2, 4 डी के साथ छिड़काव किया जाता है तो कीटनाशकों और कवकनाशी हेतु एक ही उपकरण का उपयोग न करें।
  4.  छिड़काव-द्रव शरीर के साथ संपर्क में नहीं आना चाहिए अतः शरीर के अंगो को ढँक कर रखे।
  5.  धूप तथा खुले मौसम में स्प्रे प्रभावी नियंत्रण करता है।
  6. शाकनाशी की प्रभावशीलता के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी होनी चाहिए।
  7. छिड़काव-द्रव काँच या चीनीमिट्टी  के वर्तन  में तैयार करें।
  8. एक समान स्प्रे के लिए स्प्रेयर में एक समान दबाव को बनाए रखें.

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