Peanuts Farming (Mungfali Ki Kheti Kaise Karen) Hindi

peanuts mungfali ki kheti modern kheti

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मूंगफली की खेती के लिये अच्छे जल निकास वाली,

भुरभुरी दोमट व बलुई दोमट भूमि सर्वोत्तम रहती है।

मिट्टी पलटने वाले हल तथा बाद में कल्टीवेटर से दो

जुताई करके खेत को पाटा लगाकर समतल कर लेना

चाहिए।

निराई गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण का इस फसल के

उत्पादन में बड़ा ही महत्त्व है। मूंगफली के पौधे छोटे

होते हैं। अतः वर्षा के मौसम में सामान्य रूप से

खरपतवार से ढक जाते हैं। ये खरपतवार पौधों को बढ़ने

नहीं देते। खरपतवारों से बचने के लिये कम से कम दो

बार निराई गुड़ाई की आवश्यकता पड़ती है। पहली

बार फूल आने के समय दूसरी बार 2-3 सप्ताह बाद

जबकि पेग (नस्से) जमीन में जाने लगते हैं। इसके बाद

निराई गुड़ाई नहीं करनी चाहिए।

 

: उर्वरकों का प्रयोग भूमि की किस्म, उसकी

उर्वराशक्ति, मूंगफली की किस्म, सिंचाई की

सुविधा आदि के अनुसार होता है। मूंगफली दलहन

परिवार की तिलहनी फसल होने के नाते इसको

सामान्य रूप से नाइट्रोजनधारी उर्वरक की

आवश्यकता नहीं होती, फिर भी हल्की मिट्टी में

शुरूआत की बढ़वार के लिये 15-20 किग्रा नाइट्रोजन

तथा 50-60 कि.ग्रा. फास्फोरस प्रति हैक्टर और बायोपावर 10 कि.ग्रा. के

हिसाब से देना लाभप्रद होता है। उर्वरकों की पूरी

मात्रा खेत की तैयारी के समय ही भूमि में मिला

देना चाहिए। यदि कम्पोस्ट या गोबर की खाद

उपलब्ध हो तो उसे बुवाई के 20-25 दिन पहले 5 से 10

टन प्रति हैक्टर खेत मे बिखेर कर अच्छी तरह मिला

देनी चाहिए। अधिक उत्पादन के लिए अंतिम जुताई

से पूर्व भूमि में 250 कि.ग्रा.जिप्सम प्रति हैक्टर के

हिसाब से मिला देना चाहिए।

 

कम फैलने

वाली किस्मों के लिये बीज की मात्रा 75-80

कि.ग्राम. प्रति हेक्टर एवं फैलने वाली किस्मों के

लिये 60-70 कि.ग्रा. प्रति हेक्टर उपयोग में लेना

चाहिए बुवाई के बीज निकालने के लिये स्वस्थ

फलियों का चयन करना चाहिए या उनका

प्रमाणित बीज ही बोना चाहिए। बोने से 10-15

दिन पहले गिरी को फलियों से अलग कर लेना

चाहिए। बीज को बोने से पहले 3 ग्राम थाइरम या 2

ग्राम मेन्कोजेब या कार्बेण्डिजिम दवा प्रति

किलो बीज के हिसाब से उपचारित कर लेना

चाहिए। इससे बीजों का अंकुरण अच्छा होता है

तथा प्रारम्भिक अवस्था में लगने वाले विभिन्न

प्रकार के रोगों से बचाया जा सकता है।

। मूंगफली को

कतार में बोना चाहिए। गुच्छे वाली/कम फैलने वाली

किस्मों के लिये कतार से कतार की दूरी 30 से.मी.

तथा फैलने वाली किस्मों के लिये 45 से.मी.रखें।

पौधों से पौधों की दूरी 15 से. मी. रखनी चाहिए।

बुवाई हल के पीछे, हाथ से या सीडड्रिल द्वारा की

जा सकती है। भूमि की किस्म एवं नमी की मात्रा

के अनुसार बीज जमीन में 5-6 से.मी. की गहराई पर

बोना चाहिए।

 

रोजेट (गुच्छरोग) मूंगफली का एक विषाणु (वाइरस)

जनित रोग है इसके प्रभाव से पौधे अति बौने रह जाते

हैं साथ पत्तियों में ऊतकों का रंग पीला पड़ना

प्रारम्भ हो जाता है। यह रोग सामान्य रूप से

विषाणु फैलाने वाली माहूँ से फैलता है अतः इस रोग

को फैलने से रोकने के लिए पौधों को जैसे ही खेत में

दिखाई दें, उखाड़कर फेंक देना चाहिए।

टिक्का रोग

यह इस फसल का बड़ा भयंकर रोग है। आरम्भ में पौधे के

नीचे वाली पत्तियों के ऊपरी सतह पर गहरे भूरे रंग के

छोटे-छोटे गोलाकार धब्बे दिखाई पड़ते हैं ये धब्बे

बाद में ऊपर की पत्तियों तथा तनों पर भी फैल जाते

हैं। संक्रमण की उग्र अवस्था में पत्तियाँ सूखकर झड़

जाती हैं तथा केवल तने ही शेष रह जाते हैं। इससे फसल

की पैदावार काफी हद तक घट जाती है। यह

बीमारी सर्कोस्पोरा परसोनेटा या सर्केास्पोरा

अरैडिकोला नामक कवक द्वारा उत्पन्न होती है।

भूमि में जो रोगग्रसित पौधों के अवशेष रह जाते हैं

रोमिल इल्ली

रोमिन इल्ली पत्तियों को खाकर पौधों को

अंगविहीन कर देता है। पूर्ण विकसित इल्लियों पर घने

भूरे बाल होते हैं। यदि इसका आक्रमण शुरू होते ही

इनकी रोकथाम न की जाय तो इनसे फसल की बहुत

बड़ी क्षति हो सकती है। इसकी रोकथाम के लिए

आवश्यक है कि खेत में इस कीडे़ के दिखते ही जगह-

जगह पर बन रहे इसके अण्डों या छोटे-छोटे इल्लियों

से लद रहे पौधों या पत्तियों को काटकर या तो

जमीन में दबा दिया जाय या फिर उन्हें घास-फॅूंस के

साथ जला दिया जाय।

मूंगफली की माहु

सामान्य रूप से छोटे-छोटे भूरे रंग के कीडे़ होते हैं।

तथा बहुत बड़ी संखया में एकत्र होकर पौधों के रस

को चूसते हैं।

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